नगर निकाय चुनाव के बाद ढाई साल गुजरने के बावजूद अब तक नगर निगम, नगर पालिका और नगर पंचायतों में नामित पार्षदों की नियुक्ति नहीं हो पाई है। भाजपा संगठन और योगी सरकार दोनों की नाकामी उजागर।
ढाई साल से अटका नामित पार्षदों का फैसला

लखनऊ।
उत्तर प्रदेश में नगर निकाय चुनाव संपन्न हुए अब लगभग ढाई साल हो चुके हैं, लेकिन आज तक नगर निगम, नगर पालिका और नगर पंचायतों में नामित पार्षदों की नियुक्ति नहीं हो पाई है। यह देरी न केवल भाजपा सरकार की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े करती है बल्कि संगठन की कमजोरी को भी उजागर करती है।
दुनिया की सबसे बड़ी पार्टी का दावा सवालों के घेरे में
भाजपा खुद को 14 करोड़ सदस्यों और 2 करोड़ सक्रिय कार्यकर्ताओं वाली दुनिया की सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी बताती है। पार्टी के पास देशभर में 20 राज्यों में एनडीए की सरकार और 13 राज्यों में भाजपा की अपनी सरकार है। भारत में लोकसभा के 240 सांसद, लगभग 1500 विधायक और विधान परिषद में 170 से अधिक सदस्य भाजपा के पास मौजूद हैं। इसके बावजूद एक छोटे से नॉमिनेशन का फैसला ढाई साल से अटका हुआ है, जो सरकार की इच्छाशक्ति और संगठन की दिशा दोनों पर प्रश्नचिह्न लगाता है।
शीर्ष नेतृत्व की निष्क्रियता उजागर

सबसे बड़ी बात यह है कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के करीबी सहयोगी नगर विकास मंत्री अरविंद कुमार शर्मा, राज्य मंत्री राकेश राठौर और भाजपा संगठन के प्रदेश अध्यक्ष भूपेंद्र चौधरी तक अब तक नामित पार्षदों के नाम फाइनल नहीं कर पाए। इतने लंबे समय तक किसी निष्कर्ष पर न पहुँच पाना भाजपा सरकार और संगठन की सबसे बड़ी नाकामी मानी जा रही है।
संगठन और सरकार दोनों पर सवाल
यह स्थिति भाजपा और योगी सरकार की प्रशासनिक नाकामी का स्पष्ट उदाहरण है। जनता और कार्यकर्ताओं में यह संदेश जा रहा है कि भाजपा का विशाल संगठन केवल आंकड़ों और प्रचार तक सीमित है, जबकि जमीनी स्तर पर वह एक साधारण नॉमिनेशन जैसे निर्णय में भी फेल साबित हो रही है।
